ये छोटे-छोटे, नन्हे नन्हे बच्चे बेघर हैं.
कुछ अजनबी से, कुछ पहचाने से
मगर भाग जाते हैं दूर,
जरा पास आने से
बदन के अन्दर मानो सूखा सा पड़ गया,
अपराधों की बाढ़ आ गयी,
इनके पीछे हाथ हैं उनके,
जो कहते हम हैं
जन जनपथ के !!
अब इनके हाथ में कलम नहीं
हथियार हैं,
ये अनपढ़ हैं ये गंवार हैं,
माताएं इनकी रोती हैं.
कुछ विधवाएं भी हैं
जो कहीं सोती पड़ी
जगाने पर शब्द
निकल पड़ते उनके,
कहीं वो तो नहीं
जो हैं
जन जनपथ के !!
भ्रष्टाचार की आंधी
सब को उड़ाना चाहती है
अपने में,
क्योंकि कुछ अबोध हैं
कुछ मजबूर हैं !
रास्ता भटक गए हैं,
शायद वे
निशब्द है मुख उनके,
क्योंकि कुछ प्रभाव है
उनका,
जो हैं
जन जनपथ के !!
पौधे सूख गए
लगाने से पहले,
हवा भी अब नहीं चलती
शायद कुछ
डर बैठ गया है
मन में उनके,
कि कहीं
मैं भी न बिक जाऊं
बन न जाऊं मुद्दे उनके
क्योंकि ये हैं
जन जनपथ के !!

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