Friday, 5 September 2014

आज यहाँ मदिरालय में

क्यूँ आज यहाँ मदिरालय में 
भीड़ दीवानों के दिखते हैं 
क्यूँ घंटी बजती देवालय में
गिरजाघर क्यूँ सजते हैं 
लाज उतरती नारी की
क्यूँ हाले प्याले में गिरते हैं 
ईमान खड़ा अपमानित सा 
औ ,मासूम परिंदे आज यहाँ 
क्यूँ फड़-फड करते फिरते हैं 

छलकते पैमाने

जिंदगी को जाम के प्याले में

छलकते पैमाने के तरह देखा है 

उफ़ हुस्न-ए-दीवान-ए-आलम 

मोहब्बत इस कदर कुर्बान होते देखा है 

कहता हूँ संभल जाओ 

ये हुस्न की महफ़िल सजाने वालोँ

वरना कह दूंगा आज ये

के तूफ़ान दरिया में पिघलते देखा है ||

Thursday, 4 September 2014

कौवे तलाशते घोंसले

ज़िन्दगी के फलसफे को किस नज़र से देखते हो 
जानते हो किस कदर तुम ज़िन्दगी को ठेलते हो 

है महाभारत छिड़ा देखो दुशासन आ गया
हाय इन नरभक्षियों को खादी कैसे भ गया 

ये देश का छोटा बड़ा कुछ भी हो अपमान है 
देश भेडियो के लगता जंगल सामान है 

खुदा ने इनके लिए तारीख़ मुकरीर की नहीं 
डर है की देश में ना पल रहे नाज़ी कहीं

फाईलों में हर शहर देश का न्यूयार्क है
और यहाँ मिटटी पलीती ज़िन्दगी भी खाक है

पस्त होता देख कर इंसान के जब हौंसले
कंक्रीट के भी जंगलों में कौवे तलाशते घोंसले ||

कारवां गुजर गया

अफ़सोस की ये बात है 
आज वो पुरानी रात है 
नैन अश्क नीर से
झर रहे थे पीर से । 

कारवां गुजर गया
फिर मेरे करीब से 
पर ख्वाइश थी मर चुकी 
कैसा ये जमात है
अफ़सोस की ये बात है । 

थी नज़र ज़मी हुई
आश भी बंधी हुई
पर टूटी आज यह इस कदर
कभी इधर बिखर कभी उधर बिखर
हिम्मत न हटेगा हर ज़िद पर डटेगा
क्युंकि ज़िंदा अभी ज़ज़्बात है
अफ़सोस की ये बात है ॥

Wednesday, 3 September 2014

बारिश की बूँदें जो कभी-कभी

बारिश की बूँदें
जो कभी-कभी
मेरे चिल्लाते -उफनाते
मन  को
देने तसल्ली आ जाती
मैं उड़ेल पड़ता उनको
जो कसक
मन में बन पाती ।
वो कुछ कहती
वो कुछ सुनती
वो सच्चा साथी बन कर
भर लेता आह मेरा उर
उन्हें डोर में बुनकर
वो जब थकती
वो तब रूकती
अपना गीत सुनकर मुझको
गीत मेरा ले जाती ।
मेरे चिल्लाते -उफनाते मन को
देने तसल्ली आ जाती ॥ 

Friday, 14 October 2011

जुहाई की जुबतिन

वो खड़ी उम्र की देहरी ,
                    मै उसके तासीर की ,
इबादत करता रहा |
                    पर वो कालकूट सी ,
शिरकत करती रही ,
                    जीवन में ,नव यौवन में ,
फिर भी प्याला पियूष का ,
                      मैंने उसके ओर की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
                     मै उसके तासीर की ||
कुंतल केश बढ़ा रहे थे ,
                     शोभा अरुण कपोलो के ,
अब नहीं रहा अर्भक मै ,
                      बढ़ रही व्यथा ,
धीरे -धीरे कंथा में |
                      वो उन्मन सी नेवारे की|
मै उसके तासीर की ||
                        हृदय की कंथा ,
आमंद जैसे प्रतीत हो रही
                    और जुहाई के ,
किरीट माये पर ,
                   रख की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
                    इबादत करत रहा ,
मै उसके तासीर की ||
                      












बिन विस्फारित किरणे

रवि की आभा,
            से डरती सिकुड़ती ,
कोहसे भर झर-झर ,
             के आँगन में |
मल्लिका  से दिखने वाले ,
               खिल रहे थे ,
  मेरे मन में|
               कोहसे भर झर के आँगन में|
  थे डरे ,सुबके दुबके ,
                 फिर भी बूंदे ओश की ,
लगती थी जैसे मोती की,
                  पर फूट जाती ,
छूने से ,
                 दर था मेरे आवन की ,
ख्याल आता ,
               धुनने का गर्म,
रजाई मन में |
                कोहसे भर -झर ,
के आँगन में ||
               पर फागुन भी ,
धीरे -धीरे आकर ,
               सूरज की किरणों को ,
विस्फारित करने लगते ,
                    भर देता नव यौवन इसमें |
ठिठुरन अब बेताब ,
                    खुदा हाफिस कहने को ,
छोड़ जाती अधूरापन ,
                    इस व्याकुल अंतर्मन मन |
मेरे भर -झर के आँगन में ||