Friday, 14 October 2011

जुहाई की जुबतिन

वो खड़ी उम्र की देहरी ,
                    मै उसके तासीर की ,
इबादत करता रहा |
                    पर वो कालकूट सी ,
शिरकत करती रही ,
                    जीवन में ,नव यौवन में ,
फिर भी प्याला पियूष का ,
                      मैंने उसके ओर की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
                     मै उसके तासीर की ||
कुंतल केश बढ़ा रहे थे ,
                     शोभा अरुण कपोलो के ,
अब नहीं रहा अर्भक मै ,
                      बढ़ रही व्यथा ,
धीरे -धीरे कंथा में |
                      वो उन्मन सी नेवारे की|
मै उसके तासीर की ||
                        हृदय की कंथा ,
आमंद जैसे प्रतीत हो रही
                    और जुहाई के ,
किरीट माये पर ,
                   रख की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
                    इबादत करत रहा ,
मै उसके तासीर की ||
                      












बिन विस्फारित किरणे

रवि की आभा,
            से डरती सिकुड़ती ,
कोहसे भर झर-झर ,
             के आँगन में |
मल्लिका  से दिखने वाले ,
               खिल रहे थे ,
  मेरे मन में|
               कोहसे भर झर के आँगन में|
  थे डरे ,सुबके दुबके ,
                 फिर भी बूंदे ओश की ,
लगती थी जैसे मोती की,
                  पर फूट जाती ,
छूने से ,
                 दर था मेरे आवन की ,
ख्याल आता ,
               धुनने का गर्म,
रजाई मन में |
                कोहसे भर -झर ,
के आँगन में ||
               पर फागुन भी ,
धीरे -धीरे आकर ,
               सूरज की किरणों को ,
विस्फारित करने लगते ,
                    भर देता नव यौवन इसमें |
ठिठुरन अब बेताब ,
                    खुदा हाफिस कहने को ,
छोड़ जाती अधूरापन ,
                    इस व्याकुल अंतर्मन मन |
मेरे भर -झर के आँगन में ||               

 


बीजों का भण्डारण

नहीं एक ,दो और तीजी मै,
                 मै तो पूरा भण्डारण हूँ |
मै सरिता की अंगड़ाई का ,
                कभी किसी तन्हाई का ,
नहीं किसी के रति क्रीडा का ,
                 बल्कि एक अंकुरित हूँ |
मै तो पूरा भण्डारण हूँ ||
                  ऋतुओं  की कल्पन का ,
एक उदित विश्वास,
                    लिए खड़ा है है और ,
कोई मेरा भी आश |
                      माती की कंकड़ी फ़ैल ,
कर रही मुझे बहुत बकौल,
                     मै किसी का अपनयन हूँ|
मै तो पूरा भण्डारण हूँ || 
                       बहा रही हाथों की ,
गरिमा का प्रबल स्रोत|
                       गुणधर्म मातियों का ,
कर रहा मुझे ओत प्रोत |
                       दिनकर की किरणों का ,
रूपांतरण हूँ |
                        मै तो पूरा भण्डारण हूँ ||
समीर की सिहरन का अंश ,
                         कीट पतिंगों की थिरकन ,
का दन्त |
                     मै तो मन्हारण हूँ |
मै तो पूरा भण्डारण हूँ || 
                       











Sunday, 9 October 2011

भारत -विजय

सर पर बांधे कफ़न,
               हम चले दर कदम |
सर पर बांधे कफ़न
                 मुश्किलें हों खड़ी,
सामने जो अगर ,
                  दिखा देंगे हम ,
अपने बाजू का दम |
                   सर बांधे कफ़न ,
हम चले दर कदम ||
                     तूफाँ को देंगे अपना भी परिचय ,
कहेंगे सदा वो -कहेंगे सदा वो ,
                        सदा हो भारत विजय |
पत्थर भी हम से ,
                        जो टकरायेंगे,  
गल  के पानी की बूँद भी ,
                          वो हो जायेंगे   |   
कभी न रुकेंगे -कभी न झुकेंगे  ,
                         सदा बढ़ते रहेंगे  हमारे कदम ||
छाती दुश्मनके अपने ,
                हाथों से चीर ,
हिंदोस्ता नाम लिख देंगे |
                   गिरे गर कोई दुशमन  हमारा,
सहारा भी हम अपने ,
                  हाथों का देंगे |
यही है हमारे माटी का नम|
                   पली है यहाँ पर ,
दुनिया की रागें ,
               तभी बढ़ रही दुनिया 
आगे ही आगे |
                 करें हम सदा ,
इस जहाँ को नमन 
               सर पर बांधे कफ़न
हम चले दर कदम ||



अनंत मुस्कान

खिली थी जो अधरों पर,
            वो अनंत मुस्कान कहाँ है |
छिड़ी जो कभी साज पर,
              वो बिछुड़ी तान कहाँ है |
जिन्होंने जान की,
               लगा दी बाजी
टूटे वाद्ययंत्रों पर,
               भी तान साजी |
वो खोई जवानी का अभिमान कहाँ है ?
                वो अनंत मुस्कान कहाँ है ?


समंदर के गर्तों में,
            रथ को चलाना,
आता है उनको,
             खूब वादे निभाना,
कणों से खेलकर,
           अणुबम बनाना,
वो पुरखों का बांचा ज्ञान कहाँ है ? 
          वो अनंत मुस्कान कहाँ है ||

हो रहा जहाँ,
         कर्म का गूढ़ परिचय,
और छिप रहा,
         जरा अनुनय-विनय,
वो कुरुक्षेत्र पर बांचा गया,
         बिखरा ज्ञान कहाँ है ?
वो अनंत मुस्कान कहाँ है ||

Saturday, 8 October 2011

माझी की पतवार

नभचर खोज रहे हैं नीड़.
        माझी पतवार खोजता है|

नौकाओं के घर्षण से,
       सरिता का जल तपता है,
धाराएँ हो रही वृहल,
      कोई कुछ न सुनता है||

एक रेख में सिमट रही,
        हैं रवि की संचारित किरणें,
खड़े हुए हैं पंक्ति बनाकर,
        सूरज की सौतेली बहनें,
नीरकुंड की धाराओं को,
        ये अखर ये तपता है,
माझी पतवार खोजता है ||

चन्द्रकला की चंचल किरणें,
        धाराओं की नाजुक कटि पर,
प्रहार वेग से करती हैं,
       पर प्रभात की आशा से,
ये गिरती हैं, ये उठती हैं,
       कब अधिकार संभाले माझी,
कब रजनी भय हटता है,
       माझी पतवार खोजता है||

नौकाओं के पगतल को,
       आलिंगन को मन करता है,
घर्षण से बढ़ जाता तम,
       औ, बढ़ जाती आकुलता,
शोषित होना, पीड़ित होना,
       मन को न अखरता है,
माझी पतवार खोजता है ||  

झंकृत वीणा

किस कर में मैं पुलकित होऊं,
                 किस कर में मैं झंकृत होऊं|

किस कर की अंगुली आज मुझे,
                 किस पल में मुझ पर तान सजे|
राग ध्वनित सब सुनते-फिरते,
                पर उसको न सुनते हैं,
जो मृद कंटक सा बनकर,
                उर में मेरे उठते हैं||1||

राग सजाने में जब रागी,
              सब जग को बिसराता जाये,
बढ़ जाता उर का स्पंदन,
              राग डोर की कसती जाये|
भर जाते बस कंठ यहीं पर,
            राग यहीं रूक जाती है,
शेष तान रह जाती बाकी,
             मैं कैसे विस्मृत होऊं ?
किस कर में मैं पुलकित होऊं ?
             किस कर में मैं झंकृत होऊं ||2||





Thursday, 6 October 2011

गंगा की आबरू

हाय रो रही पड़ी,
इधर मैं,
मेरा भी कुछ ध्यान करो|

रुक गया अविरल,
प्रवाह मेरा,
मैं तंग सी हो गई,
तड़प रही हूँ,
हो गई शिकार,
म्लेक्ष्ता का,
न जाता ध्यान,
इधर किसी का,
मैं तो पावन गंगा हूँ |

नर तो आखिर है चंगा,
नंगा करके गंगा को,
छिन गया संगीत मुझसे|
निर्झ्रता भी खो गई,
लुट रही मेरी आबरू,
मैं रोऊँ ध्यान इसका करके|

अब न सुनाई देता मुझे,
दो प्यारे विरह के मारे,
धड़कन की आवाज|

न जाने कहाँ खो गई,
मेरी बोधगम्यता,
उनके जिरह की आगाज,
कुछ आफजाई, कुछ फरमाइश करो,
मैं गंगा हूँ,
मेरा भी कुछ ध्यान करो||
 

चेक एक कटवाते हैं

लूट-लूट कर देश को अपने,
बस सबक एक सिखलाते हैं|
गैरों ने लूटा तो क्या,
हमारे तो पुराने नाते हैं|

तुम भी लूटो,
हम भी लूटें,
बात यही बतलाते हैं|
सीमा पर जो मरे कोई,
उससे उनका क्या होता,
आखिर वो पैसे किसके पाते हैं ?
उनकी विधवाएं जो रोयें,
तो उससे क्या,
देने उनको कन्धा हम ही तो जाते हैं|
फिर भी तसल्ली न होए,
तो चेक एक कटवाते हैं|

पर हमको उसमें क्या मिलता,
थोडा कमीशन ही पाते हैं,
ये समाजसेवी भी क्या करता,
बस अनशन-अनशन चिल्लाते हैं,
लाख मना  करते इनको,
पर बाज कभी न ये आते,
लेकिन तसल्ली होती तभी,
जब जी भर डंडा खाते हैं|

थोड़ी जो महंगाई बढती,
तन को नंगा कर देते हैं,
बस थोडा सा मिल जाता इससे,
इसी बात को लेकर सब,
हमें लुटेरा कह देते हैं|

लूट-लूट कर देश को अपने,
बस यही सबक सिखलाते हैं,
लेकर अपनी कारों को,
संसद में जब जाते हैं,
तो भी ईंधन कितना लगता,
हम ही तो मंगवाते हैं|

कितना समझाया जनता को,
फिर भी नादानी ही दिखलाते हैं,
लूट-लूट कर देश को अपने,
बस यही सबक सिखलाते हैं|| 

प्रभु अब आस कहाँ लगाऊँ

प्रभु अब आस कहाँ लगाऊँ ?

दे साहब को चुप रिश्वत,
                 या धक्के दफ्तर के खाऊं,
लगी सैकड़ों की लाइन,
                कैसे काम बनाऊं ?
प्रभु अब आस कहाँ लगाऊं ? 

कहाँ-कहाँ है देनी रिश्वत,
                कैसे लिस्ट बनाऊं ?
पद गए छोटे कागज टुकड़े,
               कितनी स्याही लाऊं ?
प्रभु अब आस ल्काहन लगाऊं ?

कैसे रीझेंगे साहब मेरे ?
              कोई जुगत न पाऊं ?
खेत खलिहान बिके इसी में,
             मुंह दाने को तरसे,
एक काम के बीते अरसे,
            गिर पानि जस गिर ओ से|
लाख जतन कर हार गई मैं,
             क्या खुद ही रिश्वत बन जाऊं ?
प्रभु अब आस कहाँ लगाऊं ?
           प्रभु अब आस कहाँ लगाऊं ?

     
 

अरुणिमा की लोहीपन

अरुणिमा की लोहीपन,
अट को व्याकुल,
खुल जाता किवाड़,
आकुल|
उठ कर मैं,
थोडा उन्मन,
शुरू कर देता अध्यापन|
प्रभात भी फेरी,
लगा रहा,
हो गई दूर,
निस्तब्धता निशा की,
गात गतिशील हो गया ,
मैं करता रहा काम सकील,
लिए निशा का संबल|
अरुणिमा का लोहीपन
अट को व्याकुल||

संग यामिनी के,
थिरकन,
मैं भी करता रहा कीर,
कभी कन्थापीर|
निशा सौंतुख लगी पगी,
और लहरें उदधि की,
बेचैन कर रही,
कर रही अकुल|
अरुणिमा की लोहीपन,
अट को व्याकुल ||  

अर्भकों की दन्तुरित मुस्कान

इन प्यारे-प्यारे अर्भकों की मुस्कान,
को थोडा दन्तुरित के बाद अच्छी लगती है |

वयस्क बना देती किताबें इन्हें,
कुछ शब्द बाहर निकलते,
कुछ मुंह में अटके,
से होते हैं,
कन्धों पर बसते,
लदने को बेताब होते,
ये बात इन्हें
अखरती
व्याकुल लगती है.
मुस्कान जो थोडा दन्तुरित के बाद की अच्छी लगती है. | |

बदन पर झिन्गुला,
खूब फबता है,
लेखनी पन्नों पर,
अक्षरों का चिन्त्रंकन,
करती नजर आती,
रटते-रटते बन जाते कीर,
करना पड़ता काम शाकिर,
थक हार जाते,
अध्यापक,
देते-देते बदस्तूर
गीले लौंदे से 
जैसा बनाओ,
बन जाते,
पहचान नहीं गुण धर्म,
मिटटी की,
पवन की थिरकन
अब बोझिल लगती है.
मुस्कान जो थोडा दन्तुरित के बाद की अच्छी लगती है | |

Wednesday, 5 October 2011

बच्चे ही बच्चों के बाप हैं

जब था विदेशी राज,
             होता था अत्याचार,
अब है स्वदेशी राज,
                हो रहा भ्रष्टाचार ||1|
क्या फिक्र थी उन्हें ?
                 क्या फिक्र है इन्हें ?
दोनों जीवन से,
                   करते रहे व्यभिचार,
जब बढे गाँधी के कदम,
                    किया गया उन्हें नमन |
अब बढे कदम अन्ना,
                         तो सरकार उन्हें करे मना||2|

नेता देश में बड़े खास हैं,
                         क्योंकि मुद्दे इनके पास है |
ये होते तभी फेल,
                   जब जनता से करे खेल |
ये मीडिया के सहारे हैं,
                      फिर भी ये बिचारे हैं |
सदा करे जनता शिकार,
                       लगे बड़े होशियार ||3|

देश की जनता गयी जाग,
                        तभी इनमे लगी आग |
सबकी अपनी है मजबूरी,
                          और बढ़ रही बीच की दूरी |
अन्ना की ये आवाज,
                           देश को कर रही आगाज |
अभी जीत आधी,
                        कल बात होगी पूरी ||4|

जीत अपनी पूरी होगी  
                           दूर कभी मजबूरी होगी  
आला अफसर रौब दिखाते
                         और हमें हैं दूर भागते!
पेशकार पैसा खूब खाते,
                         तभी फाइल अन्दर भिजवाते ||5| 

तू क्यों नाच रहा रे बन्दर,
                        जब साहब अभी नहीं हैं अन्दर
कहीं से आया उनका फ़ोन,
                        होगा आज रात में खून,
नेता जी जब जाएँ जेल,
                        तभी तो होगा आगे खेल,
हैं बढे कदम जेल की और,
                       फिर क्यों होए इतना शोर ||6| 

ये करते सदा पाप हैं,
                      लेकिन हमारे साथ हैं,
अब इनको चल गया पता,
                    बच्चे ही बच्चों के बाप हैं ||7|

Saturday, 1 October 2011

नारी अब तेरी बारी

नारी अब तेरी बारी ,
          दूर हो रही धीरे-धीरे
तेरी सारी अज़ादारी |
                   तु नेमत , तु पहचान
इबादत की ,
                    मन में तेरे नाच रहे ,
वन के सारे केकी |
                       तु जीवन की पियूष स्रोत
तुझसे जीवन ओत प्रोत |
                        तु यामिनी-तु विस्मयकारी
नारी अब तेरी बारी |
                         हैं रहे पसर पाँव धरा पे ,
कल तक भरी था पुरुष समाज ,
                        अब तु भारी इनपे |
खेत-खलिहानों में हो जाना
                         या घूंघट में रह जाना ,
खेल संगणको के संग हो ,
                     या सीमा पे जान गवाना |
भाग रहे अब धीरे-धीरे ,
                       सब निश्चारी- सब व्यभिचारी |
नारी अब तेरी बारी ||
                         करने विस्फारित अंतर्मन  को,
कालकूट सी पड़ी टूट ,
                          करने सभी संकुचित को
नहीं मुमानियत,अब यहाँ कोई ,
                            हो रहे संचालित जो कहे तु ही
तु देवी अदब-बदस्तूर की ,
                          तु बैरी जहाँ के नासूर की |
तभी होती इबादत तेरे
                 तासीर की |
तु है सब पे वारी -वारी
            नारी अब तेरी बारी |
        नारी अब तेरी बारी ||            

Tuesday, 27 September 2011

मदन से सौंतुख कश्मीर और उसकी कन्थापीर

लड़ो मत कश्मीर के लिए 
                    यह तो एक है भू खंड
फिर तुम क्यों कर
                     रहे इसे तंग |
न हिंदुस्तान -न पाकिस्तान
                       इसकी अपनी भी
है कोई पहचान ,
                        क्यों कर रहे आक्रांत 
लगा कृसानु
                       यह किरीट भारत का ,
मत करो इसे नग्न|
                          तुम जाकर जहाँ 
हो जाते मग्न||
                             फिर क्यों कर रहे 
          इसे तंग |||

ये स्वर्ग है धरती का 
                    ऐसा कभी कहा गया ,
तुम बना रहे नरक कुन्ड|
                            न कुछ कर पाती,
          निदाध इसका, 
स्वेत झिन्गूला
                     पहने हुए बुला रही 
मदन को सौंतुख ,
                     मत छीनो इसका 
     कोई सुख||
                     यह भी है,
इस धरती का अंग |
                  फिर क्यों कर ,
रहे इसे तंग ||

                    सुन लो एक बार
इसकी कंथा,
                कोई व्यथा तो नहीं इसे 
आखिर बाद तुम्हारे 
                 ये होगी किसे |
मकरंद आमंद फैला ,
                          चारों ओर,
ये कभी न करती नेवारे ,
                          देख कर हर कोई 
हो जाता इसे दंग|
                        फिर क्यों कर ,
रहे इसे तंग ||

Wednesday, 14 September 2011

बादल और विहग

बादलों से उड़ खेलता ,
                करता बात समन्दर से | 
                                छिपी गहराई निकल कर आती,
इसकी धार निरंतर से |
                 चीर समीर गगन ,
                                  में जाऊं मैं |
वह नहीं और कोई ,
                   विहाग हूँ मै ||

करूँ सवारी धूप की डोरी,
                      मंजिल अपनी रवि की है |
                                      हैं बड़ी दूरियां इसमें -मुझमे ,
पर थक कर न बैठूं मै |
                        वह नहीं और कोई ,
                                       विहग हूँ मैं ||


अंतर्तम था हृदय का व्याकुल,
                         इच्छाएं हो रही आकुल |
                                          तरु की हरिमा खींच रही ,
लिए नीड का व्याल |
                       उसमे ही रहने वाला हूँ मैं ,
                                           वह नहीं और कोई ,
                                                        विहग हूँ मैं ||
                     

भरो उड़ान विहग जगत के ,
       न देखो पीछे,
                       मुड़ -मुड़ के ,
यही संदेशा लाया हूँ मैं |
                          वह नहीं और कोई ,
                                          विहग हूँ मैं || 

देश बना सरकारी

कारी बदरी - बदरी की कजरी भी  कारी 
                          बने बसेरा तरे बदरिया ,
तर ही तर सब कारी कारी |
                           कारी अखिंयाँ की पलके कारी 
बात करें  सब कारी कारी ||
                           तभी देश बना सरकारी |
                  तभी देश बना सरकारी ||

कारा  अक्षर, कानून है कारा,
                            संविधान लिखा इसी से सारा |
  न्याय होत सब कारी
                              पहन के कारा कोट 
    बात करें सब कारी -कारी |
                              तभी देश बना सरकारी | 
                          तभी देश बना सरकारी ||

 बदरी की कजरी भी कारी |
                                 रतिया कारी
  रतिया की बतिया भी कारी .
                              रतिया बाद बचे जो कोई 
लगे नयन को कारी कारी |
                               कौआ कारा-कोकिल कारी ,
पर कोकिल की कू-कू न्यारी ,
                                तभी देश बना सरकारी |
                         तभी देश बना सरकारी ||

बदरी की कजरी भी कारी |
कारे धन की चर्चा कारी ,
                                  जाँच होत सब कारी ,
कारा ईंधन धूम्र  है कारा ,
                                 होत जगत सब कारी -कारी |
कुछ तो काटें बैठ मलाई ,
                                 कुछ तरसे भाजी तरकारी ,
 तभी देश बना सरकारी ,
              तभी देश बना सरकारी ||
 
गंगा कारी -जमुना कारी ,
                                 न होयें खत्म ये हाहाकारी ,
बढ़ें रोज जब अत्याचारी ,
                                 करैं जगत सब कारा -कारी |
तभी देश बना सरकारी |
                         तभी देश बना सरकारी ||                     

Sunday, 4 September 2011

कालिंजर की मूरत

वो कालिंजर की मूरत सी ,
                      ना जाने मुझको क्यों लगती थी |
अधरों पर उसके बिखरी छटा ,
                      कुछ पल-पल कहती रहती थी|
और न्रित्याराज नटराज के जैसे ,
                       अदा बदलती रहती थी|
वो कालिंजर की मूरत सी||
                       चंचल नयनो के बाण रूप ,
घायल सबको करते थे ,
                         एक बार गया मैं भी ठग 
          क्या खूब थी
लट भी काली घोर घटा सी||
            वो कालिंजर की मूरत सी||
ये लफ्ज पियारे दो फाको के ,
         जैसे सूरज चंदा,
माथे पर पड़ी सिकन 
                     कर देते छवि को मंदा |
पर मुख मंडल चमक रहा,
                    सूरत जैसे सन्यासी सी|
वो कालिंजर की मूरत सी||
                     सावन के बरसाती बादल ,
की सरगम थी भीगी सी|
                      मन के झूले भरे हिचकोले ,
बंधे डोर में बूंदों के,
                      उसके नयनों के,
आसूँ की बूँदें,
                टपक रही थी सूखी सी|
वो कालिंजर की मूरत सी||
            वो कालिंजर की मूरत सी||

Tuesday, 23 August 2011

उदघोषित तकल्लुफ

एक हाहाकारी अधम
    पद चाप सुनाई पड़ता  है ,
    लेकिन बिल्कुल मौन,बिल्कुल चुपचाप 
               ठीक  उसी तरह  जैसे आप.

 सवेरे की चिड़ियों 
                     की चहचाहट,
 सुनाती है किसी 
               के आने की आहट
जो कभी शिकारी थे ,
                  वो आज भी शिकारी है
    लेकिन बिल्कुल मौन, बिल्कुल चुपचाप
                         रूप बदल गया है इनका,
  पहले बेरुखे ईमान वाले
                         बाण चलाते थे,
  आज जुबान चलाते
                      फिर भी हम
     बिल्कुल निशब्द बिल्कुल चुपचाप
                  जो भूखे नंगे थे
                               वो भूखे नंगे है 
  अनाज के दाने इनसे
               भी मिलने को  तकल्लुफ करते
क्योंकि इनको डर था
             इसलिए ये रहते थे
    बिल्कुल मौन बिल्कुल चुपचाप
             रक्त स्त्राव बदन से
    होता था,
 थोडा गम था गुलामी का 
                  आज आजादी का है डर,
हर कोई निर्बाध 
             हर कोई निडर 
 और जंगलों की जड़े 
               सूखती ,रोती और
 बिलख रही है,
देती रहती हैं अपने 
             इन हत्त्यारों को अभिशाप 
    थोडा मौन थोडा चुपचाप,
   अरुणिमा धरती पर आने से
  डरती है सहमी है
                       फिर भी अनुशासित है,
   लेकिन बिल्कुल मौन
                             बिल्कुल चुप चाप||
                        










          

Saturday, 13 August 2011

जन जनपथ के

ये छोटे-छोटे, नन्हे नन्हे बच्चे बेघर हैं. 
कुछ अजनबी से, कुछ पहचाने से
मगर भाग जाते हैं दूर, 
जरा पास आने से 
बदन के अन्दर मानो सूखा सा पड़ गया, 
अपराधों की बाढ़ आ गयी,
इनके पीछे हाथ हैं उनके,
जो कहते हम हैं 
जन जनपथ के !!

अब इनके हाथ में कलम नहीं 
हथियार हैं,
ये अनपढ़ हैं ये गंवार हैं,
माताएं इनकी रोती हैं.
कुछ  विधवाएं भी हैं
जो कहीं सोती पड़ी
जगाने पर शब्द
निकल पड़ते उनके,
कहीं वो तो नहीं
जो हैं 
जन जनपथ के !!


भ्रष्टाचार की आंधी
सब को उड़ाना चाहती है
अपने में,
क्योंकि कुछ अबोध हैं 
कुछ मजबूर हैं !
रास्ता भटक गए हैं,
शायद वे 
निशब्द है मुख उनके,
क्योंकि कुछ प्रभाव है 
उनका,
जो हैं
जन जनपथ के !!

पौधे सूख गए
लगाने से पहले,
हवा भी अब नहीं चलती
शायद कुछ
डर बैठ गया है
मन में उनके,
कि कहीं 
मैं भी न बिक जाऊं
बन न जाऊं मुद्दे उनके
क्योंकि ये हैं
जन जनपथ के !!