लड़ो मत कश्मीर के लिए
यह तो एक है भू खंड
फिर तुम क्यों कर
रहे इसे तंग |
न हिंदुस्तान -न पाकिस्तान
इसकी अपनी भी
है कोई पहचान ,
क्यों कर रहे आक्रांत
लगा कृसानु
यह किरीट भारत का ,
यह किरीट भारत का ,
मत करो इसे नग्न|
तुम जाकर जहाँ
हो जाते मग्न||
फिर क्यों कर रहे
ये स्वर्ग है धरती का
ऐसा कभी कहा गया ,
तुम बना रहे नरक कुन्ड|
न कुछ कर पाती,
निदाध इसका,
स्वेत झिन्गूला
पहने हुए बुला रही
मदन को सौंतुख ,
मत छीनो इसका
कोई सुख||
यह भी है,
इस धरती का अंग |
फिर क्यों कर ,
रहे इसे तंग ||
सुन लो एक बार
इसकी कंथा,
कोई व्यथा तो नहीं इसे
आखिर बाद तुम्हारे
ये होगी किसे |
मकरंद आमंद फैला ,
चारों ओर,
ये कभी न करती नेवारे ,
देख कर हर कोई
हो जाता इसे दंग|
फिर क्यों कर ,
रहे इसे तंग ||


