वो कालिंजर की मूरत सी ,
ना जाने मुझको क्यों लगती थी |
अधरों पर उसके बिखरी छटा ,
कुछ पल-पल कहती रहती थी|
और न्रित्याराज नटराज के जैसे ,
अदा बदलती रहती थी|
वो कालिंजर की मूरत सी||
चंचल नयनो के बाण रूप ,
घायल सबको करते थे ,
एक बार गया मैं भी ठग
क्या खूब थी
लट भी काली घोर घटा सी||
वो कालिंजर की मूरत सी||
वो कालिंजर की मूरत सी||
ये लफ्ज पियारे दो फाको के ,
जैसे सूरज चंदा,
माथे पर पड़ी सिकन
कर देते छवि को मंदा |
पर मुख मंडल चमक रहा,
सूरत जैसे सन्यासी सी|
वो कालिंजर की मूरत सी||
सावन के बरसाती बादल ,
की सरगम थी भीगी सी|
मन के झूले भरे हिचकोले ,
बंधे डोर में बूंदों के,
उसके नयनों के,
आसूँ की बूँदें,
टपक रही थी सूखी सी|
वो कालिंजर की मूरत सी||
वो कालिंजर की मूरत सी||
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