बादलों से उड़ खेलता ,
करता बात समन्दर से |
छिपी गहराई निकल कर आती,
इसकी धार निरंतर से |
चीर समीर गगन ,
में जाऊं मैं |
वह नहीं और कोई ,
वह नहीं और कोई ,
विहाग हूँ मै ||
मंजिल अपनी रवि की है |
हैं बड़ी दूरियां इसमें -मुझमे ,
पर थक कर न बैठूं मै |
वह नहीं और कोई ,
विहग हूँ मैं ||
अंतर्तम था हृदय का व्याकुल,
इच्छाएं हो रही आकुल |
तरु की हरिमा खींच रही ,
लिए नीड का व्याल |
उसमे ही रहने वाला हूँ मैं ,
वह नहीं और कोई ,
विहग हूँ मैं ||
भरो उड़ान विहग जगत के ,
न देखो पीछे,
मुड़ -मुड़ के ,
यही संदेशा लाया हूँ मैं |
वह नहीं और कोई ,
विहग हूँ मैं ||

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