Thursday, 4 September 2014

कारवां गुजर गया

अफ़सोस की ये बात है 
आज वो पुरानी रात है 
नैन अश्क नीर से
झर रहे थे पीर से । 

कारवां गुजर गया
फिर मेरे करीब से 
पर ख्वाइश थी मर चुकी 
कैसा ये जमात है
अफ़सोस की ये बात है । 

थी नज़र ज़मी हुई
आश भी बंधी हुई
पर टूटी आज यह इस कदर
कभी इधर बिखर कभी उधर बिखर
हिम्मत न हटेगा हर ज़िद पर डटेगा
क्युंकि ज़िंदा अभी ज़ज़्बात है
अफ़सोस की ये बात है ॥

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