Thursday, 4 September 2014

कौवे तलाशते घोंसले

ज़िन्दगी के फलसफे को किस नज़र से देखते हो 
जानते हो किस कदर तुम ज़िन्दगी को ठेलते हो 

है महाभारत छिड़ा देखो दुशासन आ गया
हाय इन नरभक्षियों को खादी कैसे भ गया 

ये देश का छोटा बड़ा कुछ भी हो अपमान है 
देश भेडियो के लगता जंगल सामान है 

खुदा ने इनके लिए तारीख़ मुकरीर की नहीं 
डर है की देश में ना पल रहे नाज़ी कहीं

फाईलों में हर शहर देश का न्यूयार्क है
और यहाँ मिटटी पलीती ज़िन्दगी भी खाक है

पस्त होता देख कर इंसान के जब हौंसले
कंक्रीट के भी जंगलों में कौवे तलाशते घोंसले ||

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