वो खड़ी उम्र की देहरी ,
मै उसके तासीर की ,
इबादत करता रहा |
पर वो कालकूट सी ,
शिरकत करती रही ,
जीवन में ,नव यौवन में ,
फिर भी प्याला पियूष का ,
मैंने उसके ओर की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
मै उसके तासीर की ||
कुंतल केश बढ़ा रहे थे ,
शोभा अरुण कपोलो के ,
अब नहीं रहा अर्भक मै ,
बढ़ रही व्यथा ,
धीरे -धीरे कंथा में |
वो उन्मन सी नेवारे की|
मै उसके तासीर की ||
हृदय की कंथा ,
आमंद जैसे प्रतीत हो रही
और जुहाई के ,
किरीट माये पर ,
रख की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
इबादत करत रहा ,
मै उसके तासीर की ||
मै उसके तासीर की ,
इबादत करता रहा |
पर वो कालकूट सी ,
शिरकत करती रही ,
जीवन में ,नव यौवन में ,
फिर भी प्याला पियूष का ,
मैंने उसके ओर की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
मै उसके तासीर की ||
कुंतल केश बढ़ा रहे थे ,
शोभा अरुण कपोलो के ,
अब नहीं रहा अर्भक मै ,
बढ़ रही व्यथा ,
धीरे -धीरे कंथा में |
वो उन्मन सी नेवारे की|
मै उसके तासीर की ||
हृदय की कंथा ,
आमंद जैसे प्रतीत हो रही
और जुहाई के ,
किरीट माये पर ,
रख की |
वो खड़ी उम्र की देहरी ,
इबादत करत रहा ,
मै उसके तासीर की ||
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