रवि की आभा,
से डरती सिकुड़ती ,
कोहसे भर झर-झर ,
के आँगन में |
मल्लिका से दिखने वाले ,
खिल रहे थे ,
मेरे मन में|
कोहसे भर झर के आँगन में|
थे डरे ,सुबके दुबके ,
फिर भी बूंदे ओश की ,
लगती थी जैसे मोती की,
पर फूट जाती ,
छूने से ,
दर था मेरे आवन की ,
ख्याल आता ,
धुनने का गर्म,
रजाई मन में |
कोहसे भर -झर ,
के आँगन में ||
पर फागुन भी ,
धीरे -धीरे आकर ,
सूरज की किरणों को ,
विस्फारित करने लगते ,
भर देता नव यौवन इसमें |
ठिठुरन अब बेताब ,
खुदा हाफिस कहने को ,
छोड़ जाती अधूरापन ,
इस व्याकुल अंतर्मन मन |
मेरे भर -झर के आँगन में ||
से डरती सिकुड़ती ,
कोहसे भर झर-झर ,
के आँगन में |
मल्लिका से दिखने वाले ,
खिल रहे थे ,
मेरे मन में|
कोहसे भर झर के आँगन में|
थे डरे ,सुबके दुबके ,
फिर भी बूंदे ओश की ,
लगती थी जैसे मोती की,
पर फूट जाती ,
छूने से ,
दर था मेरे आवन की ,
ख्याल आता ,
धुनने का गर्म,
रजाई मन में |
कोहसे भर -झर ,
के आँगन में ||
पर फागुन भी ,
धीरे -धीरे आकर ,
सूरज की किरणों को ,
विस्फारित करने लगते ,
भर देता नव यौवन इसमें |
ठिठुरन अब बेताब ,
खुदा हाफिस कहने को ,
छोड़ जाती अधूरापन ,
इस व्याकुल अंतर्मन मन |
मेरे भर -झर के आँगन में ||
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