इन प्यारे-प्यारे अर्भकों की मुस्कान,
को थोडा दन्तुरित के बाद अच्छी लगती है |
वयस्क बना देती किताबें इन्हें,
कुछ शब्द बाहर निकलते,
कुछ मुंह में अटके,
से होते हैं,
कन्धों पर बसते,
लदने को बेताब होते,
ये बात इन्हें
अखरती
व्याकुल लगती है.
मुस्कान जो थोडा दन्तुरित के बाद की अच्छी लगती है. | |
बदन पर झिन्गुला,
खूब फबता है,
लेखनी पन्नों पर,
अक्षरों का चिन्त्रंकन,
करती नजर आती,
रटते-रटते बन जाते कीर,
करना पड़ता काम शाकिर,
थक हार जाते,
अध्यापक,
देते-देते बदस्तूर
गीले लौंदे से
जैसा बनाओ,
बन जाते,
पहचान नहीं गुण धर्म,
मिटटी की,
पवन की थिरकन
अब बोझिल लगती है.
मुस्कान जो थोडा दन्तुरित के बाद की अच्छी लगती है | |

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