Sunday, 9 October 2011

अनंत मुस्कान

खिली थी जो अधरों पर,
            वो अनंत मुस्कान कहाँ है |
छिड़ी जो कभी साज पर,
              वो बिछुड़ी तान कहाँ है |
जिन्होंने जान की,
               लगा दी बाजी
टूटे वाद्ययंत्रों पर,
               भी तान साजी |
वो खोई जवानी का अभिमान कहाँ है ?
                वो अनंत मुस्कान कहाँ है ?


समंदर के गर्तों में,
            रथ को चलाना,
आता है उनको,
             खूब वादे निभाना,
कणों से खेलकर,
           अणुबम बनाना,
वो पुरखों का बांचा ज्ञान कहाँ है ? 
          वो अनंत मुस्कान कहाँ है ||

हो रहा जहाँ,
         कर्म का गूढ़ परिचय,
और छिप रहा,
         जरा अनुनय-विनय,
वो कुरुक्षेत्र पर बांचा गया,
         बिखरा ज्ञान कहाँ है ?
वो अनंत मुस्कान कहाँ है ||

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