खिली थी जो अधरों पर,
वो अनंत मुस्कान कहाँ है |
छिड़ी जो कभी साज पर,
वो बिछुड़ी तान कहाँ है |
जिन्होंने जान की,
लगा दी बाजी
टूटे वाद्ययंत्रों पर,
भी तान साजी |
वो खोई जवानी का अभिमान कहाँ है ?
वो अनंत मुस्कान कहाँ है ?
समंदर के गर्तों में,
रथ को चलाना,
आता है उनको,
खूब वादे निभाना,
कणों से खेलकर,
अणुबम बनाना,
वो पुरखों का बांचा ज्ञान कहाँ है ?
वो अनंत मुस्कान कहाँ है ||
हो रहा जहाँ,
कर्म का गूढ़ परिचय,
और छिप रहा,
जरा अनुनय-विनय,
वो कुरुक्षेत्र पर बांचा गया,
बिखरा ज्ञान कहाँ है ?
वो अनंत मुस्कान कहाँ है ||

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