किस कर में मैं पुलकित होऊं,
किस कर में मैं झंकृत होऊं|
किस कर की अंगुली आज मुझे,
किस पल में मुझ पर तान सजे|
राग ध्वनित सब सुनते-फिरते,
पर उसको न सुनते हैं,
जो मृद कंटक सा बनकर,
उर में मेरे उठते हैं||1||
राग सजाने में जब रागी,
सब जग को बिसराता जाये,
बढ़ जाता उर का स्पंदन,
राग डोर की कसती जाये|
भर जाते बस कंठ यहीं पर,
राग यहीं रूक जाती है,
शेष तान रह जाती बाकी,
मैं कैसे विस्मृत होऊं ?
किस कर में मैं पुलकित होऊं ?
किस कर में मैं झंकृत होऊं ||2||
किस कर में मैं झंकृत होऊं|
किस कर की अंगुली आज मुझे,
किस पल में मुझ पर तान सजे|
राग ध्वनित सब सुनते-फिरते,
पर उसको न सुनते हैं,
जो मृद कंटक सा बनकर,
उर में मेरे उठते हैं||1||
राग सजाने में जब रागी,
सब जग को बिसराता जाये,
बढ़ जाता उर का स्पंदन,
राग डोर की कसती जाये|
भर जाते बस कंठ यहीं पर,
राग यहीं रूक जाती है,
शेष तान रह जाती बाकी,
मैं कैसे विस्मृत होऊं ?
किस कर में मैं पुलकित होऊं ?
किस कर में मैं झंकृत होऊं ||2||

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