Thursday, 6 October 2011

गंगा की आबरू

हाय रो रही पड़ी,
इधर मैं,
मेरा भी कुछ ध्यान करो|

रुक गया अविरल,
प्रवाह मेरा,
मैं तंग सी हो गई,
तड़प रही हूँ,
हो गई शिकार,
म्लेक्ष्ता का,
न जाता ध्यान,
इधर किसी का,
मैं तो पावन गंगा हूँ |

नर तो आखिर है चंगा,
नंगा करके गंगा को,
छिन गया संगीत मुझसे|
निर्झ्रता भी खो गई,
लुट रही मेरी आबरू,
मैं रोऊँ ध्यान इसका करके|

अब न सुनाई देता मुझे,
दो प्यारे विरह के मारे,
धड़कन की आवाज|

न जाने कहाँ खो गई,
मेरी बोधगम्यता,
उनके जिरह की आगाज,
कुछ आफजाई, कुछ फरमाइश करो,
मैं गंगा हूँ,
मेरा भी कुछ ध्यान करो||
 

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