प्रभु अब आस कहाँ लगाऊँ ?
दे साहब को चुप रिश्वत,
या धक्के दफ्तर के खाऊं,
लगी सैकड़ों की लाइन,
कैसे काम बनाऊं ?
प्रभु अब आस कहाँ लगाऊं ?
कहाँ-कहाँ है देनी रिश्वत,
कैसे लिस्ट बनाऊं ?
पद गए छोटे कागज टुकड़े,
कितनी स्याही लाऊं ?
प्रभु अब आस ल्काहन लगाऊं ?
कैसे रीझेंगे साहब मेरे ?
कोई जुगत न पाऊं ?
खेत खलिहान बिके इसी में,
मुंह दाने को तरसे,
एक काम के बीते अरसे,
एक काम के बीते अरसे,
गिर पानि जस गिर ओ से|
लाख जतन कर हार गई मैं,
क्या खुद ही रिश्वत बन जाऊं ?
प्रभु अब आस कहाँ लगाऊं ?
प्रभु अब आस कहाँ लगाऊं ?

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