लूट-लूट कर देश को अपने,
बस सबक एक सिखलाते हैं|
गैरों ने लूटा तो क्या,
हमारे तो पुराने नाते हैं|
तुम भी लूटो,
हम भी लूटें,
बात यही बतलाते हैं|
सीमा पर जो मरे कोई,
उससे उनका क्या होता,
आखिर वो पैसे किसके पाते हैं ?
उनकी विधवाएं जो रोयें,
तो उससे क्या,
देने उनको कन्धा हम ही तो जाते हैं|
फिर भी तसल्ली न होए,
तो चेक एक कटवाते हैं|
पर हमको उसमें क्या मिलता,
थोडा कमीशन ही पाते हैं,
ये समाजसेवी भी क्या करता,
बस अनशन-अनशन चिल्लाते हैं,
लाख मना करते इनको,
पर बाज कभी न ये आते,
लेकिन तसल्ली होती तभी,
जब जी भर डंडा खाते हैं|
थोड़ी जो महंगाई बढती,
तन को नंगा कर देते हैं,
बस थोडा सा मिल जाता इससे,
इसी बात को लेकर सब,
हमें लुटेरा कह देते हैं|
लूट-लूट कर देश को अपने,
बस यही सबक सिखलाते हैं,
लेकर अपनी कारों को,
संसद में जब जाते हैं,
तो भी ईंधन कितना लगता,
हम ही तो मंगवाते हैं|
कितना समझाया जनता को,
फिर भी नादानी ही दिखलाते हैं,
लूट-लूट कर देश को अपने,
बस यही सबक सिखलाते हैं||

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